Firaq Gorakhpuri Biography In Hindi – फिराक गोरखपुरी

Firaq Gorakhpuri Biography In Hindi फिराक गोरखपुरी का जीवन परिचय, Firaq Gorakhpuri Shayari  फिराक गोरखपुरी जी के बारे में पूरी जानकारी आज की पोस्ट में हम आपको देंगे। 

Firaq Gorakhpuri Biography In Hindi
Firaq Gorakhpuri Biography In Hindi

 जीवन परिचय – Firaq Gorakhpuri Biography In Hindi

फिराक गोरखपुरी का मूल नाम रघुपति सहाय “फिराक” है। उनका जन्म 28 अगस्त 1896 में उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में हुआ। वे एक अमीर परिवार से संबंधित थे उर्दू कविता के प्रति उनके मन मे छोटी आयु में ही रुझान था।

बाल्यावस्था में ही उन्होंने उर्दू में कविता लिखने आरंभ कर दी। वे साहिर, इकबाल, फैज, तथा कैफी आज़मी से अत्यधिक प्रभावित हुए। रामकृष्ण की कहानियों से आरंभ करने के बाद उन्होंने अरबी, फारसी और अंग्रेजी में शिक्षा ग्रहण की।

पढ़ाई में वे बड़े ही योग्य विद्यार्थी थे। सन 1917 में डिप्टी कलेक्टर के पद के लिए चुने गए परंतु स्वराज्य आंदोलन में भाग लेने के लिए उन्होंने 1918 में पद से त्यागपत्र दे दिया। 1920 में स्वाधीनता आंदोलन में भाग लेने के कारण उनको डेढ़ वर्ष की जेल की यात्रा सहन करनी पड़ी

वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के प्राध्यापक भी रहे।“गुल्ले नग्मा” के लिए उन्हें साहित्य अकादेमी पुरस्कार प्राप्त हुआ बाद में उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार तथा सोवियत लैंड नेहरू अवॉर्ड प्राप्त हुए सन् 1983 में उनका निधन हो गया।

फिराक गोरखपुरी जी की प्रमुख रचनाए – Firaq Gorakhpuri Biography In Hindi

” गुल्ले नग्मा “,” बज्मे जिंदगी “,” रँगे शायरी “,” उर्दू गजलगोई “।

Firaq Gorakhpuri उर्दू के कवि के रूप में विख्यात हैं प्राय साहित्य में रूमानियत रहस्य और शास्त्रीयता देखी जा सकती है।

उर्दू कवियों ने लोक जीवन तथा प्रकृति पर बहुत कम लिखा है परंतु नजीर अकबराबादी, अल्ताफ , हुसैन ,हाली जैसे कुछ कवियों ने इस परंपरा को तोड़ने का प्रयास किया।

उनमें फिराक गोरखपुरी भी एक ऐसे शायर हैं वह आजीवन धर्म निरपेक्षता के पक्षधर रहे हैं। उनका कहना था कि उर्दू केवल मुसलमानों की की भाषा नहीं है बल्कि आम भारतवासियों की भाषा है।

पंडित जवाहरलाल नेहरू उनकी इस सोच से अत्यधिक प्रभावित हुए उन्होंने फिराक को राज्यसभा का सदस्य मनोनीत किया लगभग 50 वर्षों तक वे सांप्रदायिक सद्भाव के लिए काम करते रहे। 

फिराक की कविता में कुछ स्थानों पर रूमानियत देखी जा सकती है। उन्होंने वियोग,श्रृंगार के सुंदर चित्र अंकित किए हैं।

परंतु उनका वियोग वर्णन व्यक्तिगत अनुभव पर आधारित है एक उदाहरण देखिए –

तेरे गम का पासे-अदब है कुछ दुनिया का ख्याल भी है
सबसे छिपा के दर्द के मारे चुपके चुपके रो लें हैं।

Firaq Gorakhpuri Shayari – फिराक गोरखपुरी

भारतीय परम्परा और संस्कृति को भी उन्होंने अपनी शायरी में महत्वपूर्ण स्थान दिया है।

उन्होंने अपने जीवन में जो कुछ भोगा उसे अपने काव्य में लिखा अपनी कुछ रुबाइयों में फिराक साहब ने वात्सल्य का जो वर्णन किया है।

वह बेमिसाल बन पड़ा है लगता है कि कवि सूरदास और तुलसी से प्रभावित हुआ है एक उदाहरण देखिए –

आंगन में ठुनक रहा है ज़िदयाया है
बालक तो हई चाँद पै ललचाया है

दर्पण उसे दे के कह रही है माँ
देख आईने में चांद उतर आया

कहीं कहीं कवि रक्षाबंधन, दिवाली जैसे त्योहारो को भी अपनी कविता में स्थान दिया है अन्य कवि मजदूरों तथा शोषितै का भी पक्ष लेता हुआ दिखाई देता है।

फिराक ने परंपरागत भाव बोध का और शब्द भंडार का उपयोग करते हुए उसे नई भाषा और ने विषयों से जोड़ा। उन्होंने सामाजिक दुख दर्द व्यक्तिगत अनुभूति को शायरी में डाला है इंसान के हाथों निशान पर जो गुजरती है।

उसकी तक सच्चाई और आने वाले कल के प्रति एक उमीद दोनों को भारतीय संस्कृति और लोक भाषा के प्रतीकों से दौड़कर फिराक ने अपनी शायरी का अनूठा महल खड़ा किया।

फिराक गोरखपुरी भाषा शैली

उर्दू शायरी अपने लक्षणिका प्रयोग तथा मुहावरेदारी के लिए प्रसिद्ध हैं फिराक भी कोई अपवाद नहीं हैं, उन्होंने भी यत्र तत्र न केवल मुहावरों का प्रयोग किया है बल्कि लाक्षणिक प्रयोग भी किए हैं उन्होंने साधारण जन से अपनी बात कही है।

यही कारण है कि उनकी शैली में प्रकृति मौसम और भौतिक जगत के सौंदर्य का यथार्थ वर्णन हुआ है।जहां तक उर्दू भाषा का प्रश्न है उन्होंने उर्दू के साथ साथ फारसी के शब्दों का भी सुंदर मिश्रण किया है।

कहीं कहीं वह हिंदी के साथ-साथ देशज भाषा का भी मिश्रण करते हैं उनका शब्द चयन सवर्था उचित और भावनानुकुल है।

फिराक ने हिंदी में भी रुबाइयां लिखी हैं और इन रुभाइयों में सहज एवं सरल परवाह में भाषा का प्रयोग किया है एक उदारण देखिए –

दिवाली की शाम घर पुते और सजे
चीनी के खिलौने जगमगाते लावे

वह रूपवती मुखड़े पै एक नर्म दमक
बच्चे के घरौंदे में जलाती हैं दिए।

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