Gajanan Madhav Muktibodh Biography In Hindi – गजानन माधव मुक्तिबोध

Gajanan Madhav Muktibodh Biography In Hindi , Gajanan Madhav Muktibodh In Hindi- गजानन माधव मुक्तिबोध गजानन माधव मुक्तिबोध जी के बारे में  पूरी जानकारी आज की पोस्ट में हम आपको देंगे।

Gajanan Madhav Muktibodh Biography In Hindi
Gajanan Madhav Muktibodh Biography In Hindi

Gajanan Madhav Muktibodh  – जीवन परिचय

गजानन माधव मुक्तिबोध का जन्म मध्य प्रदेश के मुरैना जनपद के श्योपुर नामक कस्बे में 13 नवंबर 1917 को हुआ उनके किसी और पूर्वज को मुक्तिबोध की उपाधि प्राप्त हुई थी। इसलिए कुलकर्णी के स्थान पर मुक्तिबोध है कहलाने लगे।

उनके पिता का नाम माधव मुक्तिबोध था , जो कि पुलिस इंस्पेक्टर थे। वे एक न्यायप्रिय अधिकारी होने के साथ साथ है धर्म तथा दर्शन में अत्यधिक रुचि रखते थे। गजानन माधव का पालन-पोषण बड़े लाड प्यार से हुआ।

वे एक योग्य विद्यार्थी नहीं थे 1930 में वे मिडिल की परीक्षा में असफल रहे, तथा 1937 में प्रथमा प्रयास में बीए की परीक्षा b.a. की परीक्षा भी उतीर्ण नहीं कर सके। उन्होंने सन् 1953 में नागपुर विश्वविद्यालय में m.a. की परीक्षा पास की।

विद्यार्थी जीवन से ही वे काव्य रचना करने लगे थे उनकी आरंभिक रचनाएं माखनलाल चतुर्वेदी द्वारा संपादित है ” कर्मवीर ” में प्रकाशित हुई थी। आरंभ में उन्होंने बड़नगर के मिडिल स्कूल में 4 महीने तक अध्यापन का कार्य किया बाद में शुजालपुर में

नगर पालिका के विद्यालय में सत्र तक का पढ़ाते रहे। 1942 में उज्जैन चले गए और वहां रहते हुए उन्होंने ” मध्य भारत प्रगतिशील लेखक संघ ” की स्थापना की।

सन 1945 में ” हंस ” पत्रिका के संपादकीय विभाग में स्थान पाया । सन 1946 – 47 मे वे जबलपुर में रहे।सन 948 में नागपुर चले गए 1958 में मुक्तिबोध राजनांदगांव के दिग्विजय कॉलेज में अध्यापक के रूप में कार्य करने लगे। 

11 सितंबर 1964 को प्रगतिशील कवि का निधन ” मेनिनजाइटिस ” रोग के कारण दिल्ली में हुआ ।

गजानन माधव मुक्तिबोध जी की प्रमुख रचनाए

मुक्तिबोध मुख्यतः कवि रूप में प्रसीद हुए लेकिन उन्हीने आलोचना , कहानी एंव डायरी लेखन में भी सफलता प्राप्त की।उनकी रचनाओं का विविध इस प्रकार हैं –

‘ तार सप्तक ‘ में संकलित सत्रह कविताए (1943) ” चांद का मुंह टेढ़ा ” , ” भूरी भूरी खाक धूल “

( कविता संग्रह ) ,” काठ का सपना ” , ” विपातर ” , ” सतह से उठता आदमी ” ( कथा साहित्य ) ;

‘कामायनी एक पुनर्विचार ‘ , तथा ‘ भारत : इतिहास और संस्कृति ‘ आदि उनकी मुख्य अन्य रचनाएं हैं इनकी कीर्ति का आधार स्तंभ ‘ चांद का मुंह टेढ़ा है ‘ जिसमें कुल 28 कविताएं संकलित हैं।

 गजानन माधव मुक्तिबोध की काव्यगत विशेषता

उनकी काव्यगत विशेषता इस प्रकार है –

(1) व्यक्तिगता तथा सामाजिकता का उद्घाटन :- मुक्तिबोध की अधिकांश कविताएं छायावादी शिल्प लिए हुए हैं  लेकिन वे व्यक्तिगता से सामाजिकता की ओर प्रस्थान करते हुए दिखाई देते हैं ।

इसलिए उनका कथ्य प्रगतिशील है कवि की व्यक्तिगता सामाजिकता से जुड़ती प्रतीत होती है। परंतु कुछ कविताओं में कवि की निराशा तथा कुंठा अभिव्यक्त हुई है। ” चांद का मुंह टेढ़ा है ” में कवि लिखता है –

” याद रखो
कभी अकेले में मुक्ति नहीं मिलती
यदि वह है तो सबके साथ

मुक्तिबोध ने स्वयं को विश्व मानव के सुख-दुख के साथ है जोड़ने का प्रयास किया है। कभी यत्र तत्र कि निराशा , कुंठा , अवसाद तथा वेदना का वर्णन करता हुआ दिखाई देता है। कवि स्वीकार करता है कि आज की व्यवस्था के नीचे दबा मानव नितांत निराश कथा हताश है कवि कहता है कि –

” दुख तुम्हें भी है ,
दुख मुझे भी है ,

हम एक ढहे हुए मकान के नीचे दबे है
चींख निकालना भी मुश्किल है । “

(2) पूंजीवादी व्यवस्था का विरोध :- आरंभ से ही मुक्तिबोध का झुकाव माक्र्सवाद की तरफ रहा है। कवि शोषण व्यवस्था से जुड़े व्यक्तियों से करीना करता है। कवि का विचार है कि उसका जीवन है

पूंजीवादी व्यवस्था की देन है जहां के लोग झूठी चमक-दमक तथा झूठी शान से निर्मित दोगली जिंदगी जी रहे हैं। कवि इस पूंजीवादी व्यवस्था को शीघ्र से शीघ्र नष्ट करना चाहता है तथा उसके स्थान पर समाजवाद लाना चाहता है।

Gajanan Madhav Muktibodh In Hindi 

(3) शोषित वर्ग के प्रति सहानुभूति :- मुक्तिबोध ने स्वयं अभावग्रस्त जीवन व्यतीत किया और गरीबों के जीवन को निकट से देखा। इसलिए कभी अपनी कविताओं में जहां एक और शोषित वर्ग के प्रति सहानुभूति व्यक्त करता है

वहीं दूसरी ओर शोषितों को आर्थिक तथा सामाजिक शोषण से मुक्त भी कराना चाहता है कवि ने अपनी कविताओं में शोषित समाज के अनेक चित्र अंकित किए हैं तथा जनहित के दृष्टिकोण को अपनाया है।

(4) व्यंग्यात्मकता :- मुक्तिबोध के काव्य मै तिखा तथा चुभने वाला व्यंग्य देखा जा सकता है।  कवि सामाजिक रूढ़ियों पर करारा व्यंग्य करता है। और यथार्थ चित्रण में विश्वास रखता है कवि का यह चित्रण अपना ही भोगा यथार्थ है।

(5) वर्ग हीन समाज की स्थापना पर बल :- मुक्तिबोध एक ऐसा वर्ग हीन समाज स्थापित करना चाहते थे जिसमें समाज तथा संस्कृति के लिए स्वस्थ मूल्यों का पोषण हो सके। वे स्वार्थपर्दता , संकीर्णता तथा भाई भतीजावाद को समाप्त करना चाहते थे।

उनका विचार था की भारत में साम्यवाद की स्थापना अवश्य होगी और भारतवासी शोषण के चक्कर से मुक्त हो सकेंगे इसलिए कवि कहता है –

” कविता में कहने की आदत नहीं , पर कह दूं ,
वर्तमान समाज चल नहीं सकता ,

पूंजी से जुड़ा हदय बदल नहीं सकता ,
स्वातंत्र्य व्यक्ति का वादी

छल नहीं सकता मुक्ति के मन को ,
जन को।”

गजानन माधव मुक्तिबोध की भाषा शैली

मुक्तिबोध के काव्य का कलापक्ष भी काफी समृद्ध है । परन्तु बिम्बात्मकता का अधिक सहारा लेने के कारण उनकी कविता कुछ स्थलों पर जटिल सी हो गई है। वे अनेक प्रकार के कल्पना चित्रो तथा फेंटसियो का निर्माण करते हुए चलते है 

वस्तुतः मुक्तिबोध ने साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग किया है यदि इसमें संस्कृत के तत्सम प्रधान शब्द है तो अंग्रेजी , उर्दू , फ़ारसी के शब्द भी है। उनकी कविता प्रतीकों के लिए प्रसिद्ध है उनके प्रतीक पारंपरिक का भी है और नवीन भी।

मुक्तिबोध ने अपने काव्य भाषा में उपमा , मानवीकरण , रूपक , उत्प्रेक्षा तथा अनुप्रास आदि अलंकारो का स्वाभाविक रूप से वर्णन करता है।

कवि शमशेर सिंह बहादुर ने उनकी काव्य कला के बारे में सही ही लिखा है- ” अद्भुत संकेतों भरी , जिज्ञासाओ से अस्थिर , कभी दूर से शोर मचाती , कभी कानों में चुपचाप राज की बातें कहीं चलती है।

हमारी बातें हमको सुनाती है हम अपने को एकदम सखी तो करें देखते हैं और पहले से अधिक पहचानने लगते हैं । ”

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