कबीर दास जी के 32 दोहे Kabir Das Ke Dohe with Meaning

कबीर दास जी के 32 दोहे Kabir Das ke Dohe with Meaning ऐसे दोहे आपको बताने जा रहे है। जिस से आपकी ज़िन्दगी में चार चाँद लग जाएंगे और आपकी Life खुशियों से भर जाएगी।

Kabir Das Ke Dohe with Meaning

Kabir Das Ke Dohe with Meaning – कबीर दास जी के 32 दोहे

1. गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागू पाय। बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताए।

अर्थ :- गुरु और गोविंद (भगवान) दोनों एक साथ खड़े हैं, पहले किसके चरण स्पर्श करें कबीरदास जी कहते हैं, पहले गुरु को प्रणाम करूँगा क्योंकि, आपने गोविन्द तक पहुंचने का मार्ग बताया है।

2. जग में बैरी कोई नहीं, जो मन शीतल होय। यह आपा तो डाल दे, दया करे सब कोय।

अर्थ :- अगर हमारा मन शीतल है तो इस संसार में हमारा कोई बेरी नहीं हो सकता। अगर अहंकार छोड़ दे तो हर कोई हम पर दया करने को तैयार हो जाता है।

3. साईं इतना दीजिए, जा मे कुटुम समाय। मैं भी भूखा ना रहूं, साधु न भूखा जाए।

अर्थ :- कबीरदास जी कहते हैं कि हे परमात्मा तुम मुझे केवल इतना दो कि जिसमें मेरा गुजारा चल जाए। मैं भी भूखा ना रहूं और अतिथि को भी भूखे वापस ना जाने दूँ।

4. अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप। अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।

अर्थ :- न तो अधिक बोलना अच्छा है, न ही जरूरत से ज्यादा चुप रहना ही ठीक है। जैसे बहुत अधिक वर्षा भी अच्छी नहीं होती और बहुत अधिक धुप भी अच्छी नहीं।

5. धीरे – धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय,माली सींचे सौ घड़ा ऋतु आए फल होय।

अर्थ :- मन में धीरज रखने से सब कुछ होता है। अगर कोई माली किसी पेड़ को 100 घड़े पानी से सींचने लगे तब भी फ़ल तो ऋतु आने पर ही लगेगा।

6. बुरा जो देखन में चला, बुरा न मिलिया कोय, जो दिल खोजा आपना मुझसे बुरा न कोय।

अर्थ :- जब मैं इस संसार में बुराई खोजने चिला तो मुझे कोई बुरा ना मिला। जब मैंने अपने मन में झाँक कर देखा तो पाया कि मुझसे बुरा कोई नहीं है।

7. दुख में सुमिरन सब करे सुख में करे न कोय। जो सुख में सुमिरन करे तो दुख काहे को होय।

अर्थ :- कबीरदास जी कहते हैं कि दुख के समय सभी भगवान को याद करते हैं पर सुख में कोई नहीं करता। यदि सुख में भी भगवान को याद किया तो दुःख हो ही क्यों।

8. निंदक नियरे राखिए, आंगन कुटी छवाय, बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।

अर्थ :- जो हमारी निंदा करता है उसे अपने अधिकाधिक पास ही रखना चाहिए। वह तो बिना साबुन पानी के हमारी कमियां बता कर हमारे स्वभाव को साफ करता है।

9. कबीरा खड़ा बाजार में, मांगे सबकी खैर, ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर।

अर्थ :- कबीरदास जी कहते हैं कि इस संसार में आकर कबीर अपने जीवन में बस यही चाहते हैं। कि सबका भला हो और संसार में यदि किसी से दोस्ती नहीं तो दुश्मनी भी न हो।

10. जिन खोजा तिन पाइयां, गहरे पानी पैठ, मैं बपूरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ।

अर्थ :-  Kabir Das Ke Dohe कबीरदास जी कहते हैं कि जो प्रयत्न करते हैं, वह कुछ ना कुछ वैसे ही पा लेते हैं। जैसे कोई मेहनत करने वाला गोताखोर गहरे पानी में जाता है और कुछ लेकर आता है। लेकिन कुछ बेचारे लोग ऐसे भी होते हैं जो डूबने के भय से किनारे पर ही बैठे रह जाते हैं और कुछ नहीं पाते। 

कबीर जी के दोहे अर्थ सहित – Kabir Das ke dohe in hindi 

11. प्रेम-भाव एक चाहिए भेष अनेक बनाएँ, भावी घर में बात करें भावै वन में जाएं।

अर्थ :- हमेशा ईश्वर के प्रति एक प्रेम-भाव होना चाहिए। चाहे कैसा भी रूप धारण कर लो या कोई भी भेष बना लो। चाहे सांसारिक बंधनों में बंद कर गृहस्थ जीवन बिता रहे हो या फिर वन के एकांत वातावरण में वैराग्य पूर्ण जीवन बिता रहे हो। जीवन का कैसा भी स्वरूप हो वह प्रेम-भाव सदा बना रहना चाहिए। ऐसा प्रेम-भाव जो हर स्थिति हर रूप हर उम्र में एक समान बना रहे। वो सिर्फ परम-पिता परमात्मा से ही स्थापित हो सकता है।

12. बाहर क्या दिखलाएं, अंतर जपिए राम, कहां काज संसार से, तुझ से धानी से काम।

अर्थ :- कबीर जी कहते हैं भगवान के नाम का जप बाहरी दिखावे के लिए नहीं, नाम को आंतरिक रूप से जपना चाहिए। हमें संसार के लोगों से नहीं संसार के मालिक से संबंध रखना है।

13. फल कारण सेवा करे, करे न मन से काम, कहे कबीर सेवक नहीं, चाहे चौगुना धाम।

अर्थ :- कबीर जी कहते हैं, वे व्यक्ति जो भगवान की सेवा करते हैं पर उसके बदले में उसका फल भी चाहते हैं। वे वास्तव में भगवान के भक्त नहीं है। वे सेवा नहीं मजदूरी कर रहे हैं।

14. कहे भरोसा देह का, बिनस जात छन माही, साँस साँस सुमिरन करो, और यत्न कुछ नाहीं।

अर्थ :- कबीर जी कहते हैं इस नश्वर शरीर का कोई भरोसा नहीं है यह कभी भी मर सकता है।हमें हर एक श्वास में भगवान के नाम का जप करने का यत्न करना चाहिए।

15. उज्जवल पहने कापड़ा पान सुपारी खाए, एक हरि के नाम बिन, बंधा यमपुर जाए।

अर्थ :- कबीर जी कहते हैं वे लोग जो कपड़े तो चमकदार पहनते हैं। और अपने मुख में सुपारी रखते हैं। पर हरी या परमात्मा के नाम का जप नहीं करते, वे तो यमलोक ही जायेंगे। (भगवान के पास नहीं)

16. अवगुन कहूं शराब का, आपा अहमक होये, मानुष से पशुआ भये दाम गाँठ से खोएं।

अर्थ :- कबीर जी कहते हैं, मैं शराब को अवगुण कहता हूं। शराब पीकर व्यक्ति अपना आप खो देता है। मनुष्य से पशु बन जाता है ऊपर से अपने पैसे भी व्यर्थ गवाता है।

17. कबीरा गरब न कीजिए, कभू न हासिये कोय, अजहू ना समुद्र में, न जाने का होए।

अर्थ :- कबीर जी कहते हैं हमें गर्व कभी नहीं करना चाहिए। कभी किसी के ऊपर हंसना नहीं चाहिए। हमारा जीवन तो एक नाव के समान है क्या पता हमारे साथ भी कल क्या होगा।

18. कुटिल वचन सबसे बुरा, जासे हात न हार, साधु वचन जल रूप है, बरसे अमृत धार।

अर्थ :- कबीर जी कहते हैं बुरे वचन बोलना सबसे बुरी बात है। पूरे भजन बोलने से कोई जीत हार नहीं होती (शर्म की बात होती है) सुवचन तो अमृत के समान सुनने वालों पर बरसते हैं।

19. कबीर आप थागायीये,और न ठगिये कोय, आप ठगे सुख होत है और ठगे दुख होय।

अर्थ :- कबीर जी कहते हैं हमें दूसरों को कभी नहीं ठगना/ बेवकूफ बनाना चाहिए। भले हम स्वयं बेवकूफ बन जाए, दूसरों को बेवकूफ बनाने से दुख होता है। स्वयं को बेवकूफ बनाने से सुख होता है।

20. नहाए धोए क्या हुआ, जो मन मेल ना जय मीन सदा जल में रही, धोये बास न जाए।

अर्थ :- कबीर जी कहते हैं नहाने धोने का लाभ क्या यदि आप का मन ही अंदर से मेला है। ये तो उसी प्रकार हुआ जैसे एक मछली तो सारा जीवन जल में ही रहती है। परंतु उसमें सिर्फ दुर्गंध आती है।

Kabir Das Ke Dohe – कबीर दास के दोहे जो बदले देंगे लाइफ 

21. रात गंवई सोय के, दिन गंवाया खाय के, हीरा जन्म अनमोल था, कोड़ी बदले जाए।

अर्थ :- कबीर जी कहते हैं हमने रात तो सो कर गवा दी और दिन खाकर गवा दिया। हमारा मनुष्य जन्म हीरे के समान अमूल्य था, हमने इसे व्यर्थ के कामों में लगा दिया।

22. संगति से सुख उपजे, कुश्ती से दुख होय, कह कबीर तह जाइए, साधु संग जा होए।

अर्थ :- कबीर जी कहते हैं कि अच्छी संगति से सुख होता है और बुरी संगति से दुख होता है। व्यक्ति को सदा साधु, सज्जन व्यक्तियों के ही संगति में रहना चाहिए।

23. साहेब तेरी साहिबी, सब घट रही समाय, ज्यो मेहँदी के पात में, लाली राखी न जाय।

अर्थ :- कबीर जी कहते हैं, हे प्रभु आपकी प्रभुता तो संसार की सभी वस्तुओं में है जैसे मेहंदी के पत्तों में लालिमा।

24. जैसी मुख तें निकसै , तैसी चाले चाल। पारब्रहा नेड़ा रहै, पल में करें निहाल।

अर्थ :- मुँह से जैसी बात निकले, उसी पर यदि आचरण किया जाय , वैसी ही चली जाएं चाल, तो भगवन तो अपने पास ही खड़ा है। और वह उसी क्षण निहाल कर देगा।

25. विषय वासना उलझकर जन्म गवाया बात अब पछतावा क्या करें, निज करणी कर याद।

अर्थ :- तुमने विषय वासनाओं में उलझ कर सारा जीवन व्यतीत कर दिया।आज पछताने पर क्या होगा, अपने किये हुए कर्मों को याद करो।

26.ज्ञान समागम प्रेम सुख , दया भक्ति विश्वास guru सेवा ते पाइये, सतगुरु चरण निवास।

अर्थ :- Kabir Ji कहते है की ज्ञान से , सत्संगति से prem से , भक्ति ,श्रद्धा से , guru सेवा से सतगुरु रूपी परमात्मा के चरणों में निवास मिलता है।  

27. गुरु कुम्भार सीस कुंभ है, घड़ी घड़ी काडे खोट अंदर हाथ सवर दे, बाहर मारे चोट।

अर्थ :- गुरु कुम्हार की तरह होते हैं जैसे कुम्हार बहार से तो चोट मारता है पर अंदर से उसको सही आकार देता है। ऐसे ही हमारे गुरुजन भी बाहर से डांटते हैं पर अंदर से वे हमारे सुधार के लिए ही कार्य कर रहे होते हैं।

28. कबीरा मन पंछी भया, भावे तहा आ जाय तो जैसी संगत करें, सो तेसा फल पाए।

अर्थ :- मन तो पंछी के समान ही होता है, जहाँ इसको अच्छा लगता है, वहां ये उड़ता है। अच्छे लोगों की संगति में रहेंगे तो मन भी अच्छे कर्मों की ओर प्रेरित होगा।

29. कबीरा ज्ञान विचार बिन, हरी ढूंढने को जाय तन में त्रिलोकी बसे, अब तक परखा नाय।

अर्थ :- हम सही ज्ञान के बिना हरि परमात्मा को ढूंढ रहे हैं। वास्तव में परमात्मा कहीं और नहीं हमारे अंदर ही है बस केवल हमें उसे ठीक से ढूंढना नहीं आता है।

30. दास कबीर कहै समुझाई, अंत समय तेरा कौन साहाई, चला अकेला संग ना कोई, कीया अपना पावेगा।

अर्थ :- मैं तुम्हें समझाता हूं, देखो कौन तुम्हारे अंत समय में तुम्हारी सहायता करेगा? तुम्हें अकेले ही जाना होगा, जो कर्म तुमने किये हैं उनको तुम्हें स्वयं ही भोगना होगा।

31. गुरु धोबी सिख कपड़ा, साबू सिर्जन हार, सुरती सीलापुर धोइए, तो निकसे ज्योति अपार।

अर्थ :- गुरु तो धोभी के समान होते हैं और शिष्य कपड़े के समान तथा परमात्मा साबुन के समान, गुरु द्वारा हमारे मन रूपी कपड़े को साफ करने से परमात्मा की चमक दिखाई देती है।

32. हम तो एक एक करि जाना दोई कहें तिन्ही क़ो दोजग जिन नाहिन पहिचाना। एके पवन एक ही पानी एके जोति समाना। एके खाक गढ़े सब भांडे एके कोहरा साना।जैसे बाढ़ी कष्ट ही काटे अगिनि न काटे कोई। सब घटि अंतरि तुंही व्यापक धरे सरूपे सोई। माया देखि के जगत लुभाना काहे रे नर गरबाना। निरभै भया कछू नहि ब्यापै कहे कबीर दीवाना।

अर्थ :- कबीर का कथन है कि हम तो उस एक परमात्मा को एक ही मानते हैं। वही सब जगह समाया हुआ है। जो लोग यह नहीं मानते व जानते अर्थात जो जीव और ब्रह्म, आत्मा और परमात्मा को दो अलग-अलग सत्ता मानते हैं। उन्होंने वास्तव में ईश्वर के स्वरूप को पहचाना ही नहीं। उनके लिए संसार नर्क है कबीर ने अपने मत भक्तों

को प्रमाणित करते हुए कहा है। कि एक ही पवन बहती है एक ही जल प्रवाहित होता है। तथा समस्त संसार में एक ही ज्योति विद्वान है। जिस प्रकार कुम्हार एक ही प्रकार की मिट्टी से विभिन्न प्रकार के बर्तन बनाता है, उसी प्रकार ईश्वर ने पंचतत्व रूपी मिट्टी से सभी प्रकार के प्राणियों का निर्माण किया है। वही सभी प्राणियों में विद्यमान है जिस प्रकार बढ़ई लकड़ी को काट सकता है, किंतु उसमें विद्यमान आग

को नहीं काट, सकता ठीक उसी प्रकार इस संसार के प्रत्येक प्राणी के भीतर ईश्वर की सत्ता समाई हुई है। प्राणियों का शरीर नश्वर है किंतु ईश्वर अमर है, अघट्टाय हैं। परमात्मा सभी प्राणियों में व्याप्त है।विभिन्न प्राणि यों के रूप में परमात्मा नहीं विभिन्न रूप धारण किए हुए हैं।

कबीर मनुष्य को चेतावनी देता हुआ कहता है हे मनुष्य माया के आकर्षक रूप को देखकर संसार उस पर लुब्ध हैं। भला तो इस झूठ एवं नश्वर माया पर क्यों घमंड करता है।परमात्मा के प्रेम में दीवाना कबीर कहता है कि जो लोग माया के बंधन से मुक्त हैं, इस शहर में निर्भय होकर रहते हैं। उनमें किसी प्रकार का व्यापक नहीं हो सकता।

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