Premchand Ka Jivan Parichay – मुंशी प्रेमचंद का जीवन परिचय

Premchand Ka Jivan Parichay – मुंशी प्रेमचंद का जीवन परिचय  नमस्कार दोस्तों आज की हमारी पोस्ट है Prem chand life history in hindi प्रेमचंद हिंदी साहित्य के महान कथाकार थे। वे हिंदी के प्रथम साहित्यकार हैं, जिन्होंने साहित्य में जनजीवन को स्थान दिया।

वे स्वंय आजीवन आर्थिक अभावों का सामना करते रहे और उन्होंने अपने आसपास आर्थिक और सामाजिक शोषण को नजदीक से देखा। प्रेमचंद का जन्म 31जुलाई 1880 में बनारस के निकट लमही नामक गांव के एक साधारण कायस्थ परिवार में हुआ था।

Premchand Ka Jivan Parichay

Premchand Ka Jivan Parichay – मुंशी प्रेमचंद का जीवन परिचय

मुंशी प्रेमचंद का मूल नाम धनपत राय था। 5 वर्ष की आयु में ही उनकी माता का देहांत हो गया था। उनके पिता ने दूसरा विवाह कर लिया था विमाता (सौतेली मां) का व्यवहार उनके प्रति अच्छा नहीं था 13 वर्ष की आयु में उनका विवाह कर दिया गया था। 14 वर्ष की आयु में पिता की मृत्यु के पश्चात परिवार का सारा बोझ उनके कंधों पर आ पड़ा ।

16 वर्ष की आयु में ही उन्हें एक स्कूल में अध्यापक की नौकरी करनी पड़ी। नौकरी के दौरान ही प्रेमचंद जी डिप्टी इंस्पेक्टर के पद तक पहुंचे। वे स्वभाव से स्वाभीमानी थे। सन 1928 में प्रेमचंद जी नौकरी से त्यागपत्र देकर गांधी जी द्वारा चलाए गए राष्ट्रीय आंदोलन में कूद पड़े थे।

उन्होंने जीवन-पर्यंत साहित्य-सेवा की। निरन्तर साहित्य लेखन करते हुए 8, अक्टूबर 1936 को इस महान साहित्यकार का निधन हो गया। मुंशी प्रेमचंद ने आरंभ में उर्दू में लिखना शुरू किया तथा बाद में हिंदी में आए थे।

उन्होंने वरदान,सेवासदन, रंगभूमि, कर्मभूमि, गमन, निर्मला, प्रेमाश्रम, गोदान आदि 11 उपन्यासों की रचना की है। तथा 300 के लगभग कहानियां लिखी हैं जिनमें कफ़न, पूस की रात, दो बैलों की कथा, पंच परमेश्वर, बड़े घर की बेटी, शतरंज के खिलाड़ी, आदि प्रमुख है।

मुंशी प्रेमचंद कहानी कला की विशेषताएं

मुंशी प्रेमचंद का संपूर्ण कहानी – साहित्य ‘मानसरोवर’ के आठ भागों में संकलित है। कहानी कला की दृष्टि से प्रेमचंद अपने युग के श्रेष्ठ कहानीकार है। उन्होंने अपने कहानी साहित्य में जीवन के विभिन्न पहलुओं को विषय बना कर कहानी को जन जीवन से जोड़ा है। उनकी कहानी – कला की प्रमुख विशेषताएं इस प्रकार हैं।

मुंशी प्रेमचंद विषय की विभिन्नता

मुंशी प्रेमचंद की कहानियों में विभिन्न विषयों का वर्णन किया गया है। उन्होंने जीवन की विविध पक्षों पर जमकर कलम चलाई है। उनकी कहानियों के विषय की व्यापकता पर टिप्पणी करते हुए डॉ हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लिखा है। “प्रेमचंद शताब्दियों से पददलित, अपमानित और शोषित कृषकों की आवाज़ थे। पर्दे में कैद, पद – पद पर लांछित, अपमानित और शोषित नारी जाति की महिमा के वे जबरदस्त वकील थे,

गरीबों और बेकसों के महत्व के प्रचारक थे। अगर आप उत्तर भारत की समस्त जनता के आचार-विचार, भाषा-भाव, रहन-सहन, आशा-आकांक्षा, सुख-दुख और सूझबूझ जानना चाहते हैं। तो प्रेमचंद से उत्तम परिचायक आपको नहीं मिल सकता। उनकी कहानियों में तत्कालीन समाज का सजीव चित्र देखा जा सकता है।”

Premchand Ka Jivan Parichay – गांधीवादी विचारधारा का प्रभाव 

मुंशी प्रेमचंद के संपूर्ण साहित्य पर गांधीवादी विचारधारा का प्रभाव देखा जा सकता है। इस संबंध में मुंशी प्रेमचंद स्वीकार करते हुए लिखते हैं- “मैं दुनिया में महात्मा गांधी को सबसे बड़ा मानता हूं उनका उद्देश्य यही है।  कि मजदूर और काश्तकार सुखी हो महात्मा गांधी हिंदू मुसलमानों की एकता चाहते हैं मैं भी हिंदू और उर्दू को मिलाकर हिंदुस्तानी बनाना चाहता हूँ। यही कारण है कि प्रेमचंद की कहानियों में गांधीवादी

विचारधारा की झलक सर्वत्र देखी जा सकती है उनके पात्र गांधीवादी आदर्शों पर चलते हैं और उनका समर्थन करते हैं।

Premchand Ka Jivan Parichay – मानव – स्वभाव का विश्लेषण

मुंशी प्रेमचंद अपनी कहानियों में जहां अपने पात्रों को बाह्म आकार व रूप-रंग वर्णन किया है। वहाँ उनके मन सूक्ष्म विवेचन-विश्लेषण किया है वह मनोवैज्ञानिक  दृष्टिकोण से मुक्त कहानी को उत्तम मानते थे। मनोवैज्ञानिक विश्लेषण के विषय में

लिखा है।- “वर्तमान आख्यायिका का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण, जीवन के यथार्थ और स्वाभाविक चित्रण को अपना ध्येयसमझती है।”

मुंशी प्रेमचंद का ग्रामीण – जीवन का चित्रांकन

मुंशी प्रेमचंद में जितना ग्रामीण जीवन का वर्णन किया है। उतना वर्णन किसी अन्य कहानीकार ने नहीं किया। उन्होंने कथा-साहित्य को जन-जीवन से जोड़ने का सार्थक प्रयास किया है। उनकी कहानियों में ग्रामीण-जीवन की विभिन्न समस्याओं का यथार्थ चित्रण सहानुभूति पूर्वक किया गया है। उन्होंने अपने कथा-साहित्य में गांव के गरीब किसानों, मजदूरों, कास्तकारों, दलितों और पीड़ितों के प्रति विशेष संवेदना दिखाई है।

मुंशी प्रेमचंद की आदर्शान्मुखी यथार्थवाद

मुंशी प्रेमचंद ने अपनी कहानियों में जीवन की विभिन्न समस्याओं का यथार्थ चित्रण किया है, किंतु उनके समाधान प्रस्तुत करते हुए आदर्श भी प्रस्तुत किए हैं इस प्रकार, इनकी कहानियों मे यथार्थ एवं आदर्श का अनुपम सौंदर्य है। इस विषय में प्रेमचंद जी का स्पष्ट मत है कि साहित्यकार को नग्नतायोओं का पोषक  न बनकर मानवीय स्वभाव की उज्जवलताओ को भी दिखाने वाला होना चाहिए।

munshi premchand मुंशी प्रेमचंद की भाषा शैली

मुंशी प्रेमचंद आरंभ है उर्दू भाषा में लिखते थे और बाद में उन्हें हिंदी भाषा में लिखना आरंभ किया। इसलिए उनकी लेखन भाषा में उर्दू के शब्दों का प्रयोग तो होना स्वभाविक है। इनकी कहानियों की भाषा जितना सरल, स्पष्ट और  भावानुकूल है उतनी ही व्यवहारिक भी है। लोक प्रचलित मुहावरों और लोकोक्तियों के प्रसंगानुकूल प्रयोग से इनकी भाषा में गठन एवं रोचकता का समावेश हुआ है।

कहीं-कहीं मुहावरों के प्रयोग की झड़ी-सी लग जाती है। सूक्तियों के प्रयोग में तो प्रेमचंद बेजोड़ हैं। प्रेमचंद की कहानियों में भावानुकूल एवं पात्रानुकूल भाषा का सार्थक प्रयोग किया गया है। सफल समाज-योजना के कारण उनकी भाषा शैली में नाटकीयता के गुण समावेश हुआ है। कहानियों में वर्णन-शैली के साथ-साथ व्यग्यत्मक शैली का भी

सफल प्रयोग किया गया है। प्रेमचंद जी की भाषा शैली में प्रेरणा देने की शक्ति के साथ-साथ पाठकों को चिंतन के लिए उकसाने भी पूर्ण क्षमता है अपनी कहानी-कला की प्रमुख विशेषताओं के कारण प्रेमचंद अपने युग के सर्वश्रेष्ठ कहानीकार माने जाते हैं।

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