Vishwa Paryavaran Sanrakshan Diwas Kab Manaya Jata Hai – विश्व पर्यावरण संरक्षण पर कहानी

Vishwa Paryavaran Sanrakshan Diwas Kab Manaya Jata Hai 5 Juneविश्व पर्यावरण संरक्षण पर कहानी विश्व पर्यावरण संरक्षण संयुक्त राष्ट्र ने 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस के रूप में नामित किया है ताकि यह उजागर किया जा सके।

कि पर्यावरण की सुरक्षा और स्वास्थ्य एक प्रमुख मुद्दा है, जो दुनिया भर में लोगों की भलाई और आर्थिक विकास को प्रभावित करता है। इस दिन का उत्सव हमें पर्यावरण को संरक्षित और बढ़ाने में व्यक्तियों, उद्यमों और समुदायों द्वारा एक प्रबुद्ध राय और जिम्मेदार आचरण के आधार को व्यापक बनाने का अवसर प्रदान करता है।

Vishwa Paryavaran Sanrakshan Diwas Kab Manaya Jata Hai
Vishwa Paryavaran Sanrakshan Diwas Kab Manaya Jata Hai

Vishwa Paryavaran Sanrakshan Diwas Story In Hindi 

सुहानी सुबह थी एक बुजुर्ग एक बाल्टी पानी, मग्गा ,एक अमरूद का पेड़ और हाथ मे फावड़ा लेकर अपने घर के पास सड़क के किनारे पेड़ रोपने के लिए लेकर जा रहे थे। मैंने उनको देखा मंगलु चाचा मेरे मोहल्ले के सबसे बुजुर्ग आदमी है उनकी उम्र लगभग 95 साल के आस -पास है चाचा उम्र के इस पड़ाव में भी काफी active हैं।

सुबह जल्दी उठना, सारे कामों से निपटकर सामाजिक कामों में ही उनका ज्यादातर समय बीतता है। हालांकि उम्र का असर कहीं न कहीं दिख ही जाता है। लेकिन फिर भी उम्र को देखा जाए तो उनकी energy कमाल की है लगभग सारे काम खुद करते है सामाजिक तौर पर भी कुल मिलाकर बोहोत बढ़िया उनका व्यवहार और काम है। तो उनको पेड़ लगता देख हमारे मोहल्ले के ही आनंद भाई भी उनके पास आ खड़े हुए।

और ऐसे ही मजाक के लहज़े में बोले…चाचा आप ये पेड़ तो लगा रहे हो लेकिन आप तो इसके फल नहीं खा पाओगे। आनंद भाई का इशारा उनकी उम्र की तरफ था जिसको चाचा को समझते देर न लगी… चाचा उनकी तरफ देखकर पहले तो मुस्कुराये…☺️

फिर बड़े गंभीर स्वर में बोले … बेटा हाँ हो सकता है मैं ना खा पाऊँ और मुझे भी कुछ ऐसा ही लगता है लेकिन मैं नहीं खा पाया तो क्या हुआ…तुम तो खाओगे…ये कहते ही आनंद भाई या तो बिल्कुल funny मूड़ में थे या एकदम सकपका गए।

बिल्कुल emottional से हो गए वो आये तो थे के चलो चाचा से कुछ हंसी मज़ाक किया जाए मगर अब वो बिल्कुल शान्त हो चाचा को पेड़  लगाते देख रहे थे ये तो कहा ही चाचा ने आगे बोले … बेटा हर काम सिर्फ अपने स्वार्थ के लिए ही नहीं किया जाता। कुछ काम बिना किसी स्वार्थ के भी कर लेने चाहिए। औऱ दूसरा ये के मेरी उम्र 95 साल के आस पास है और मैंने बचपन से लेकर जवानी और अब बुढापा ना जानें कितने फ़ल खाये हैं।

जबकि जिन पेडों के फलों को मैंने खाया है उनमें से किसी पेड़ को मैंने नहीं लगाया। जिन्होंने उन पेडों को लगाया था उनमें से सबने अपने लगाये पेडों के फ़ल नहीं खाए होंगे। तो फिर मैं इस उम्मीद के साथ पेड़ क्यों लगाऊं … के जिस पेड़ को मैं लगा रहा हूँ उसके फ़ल मैं भी  खा पाऊंगा।

मैं इतना भी स्वार्थी नहीं। सच मानों  दोस्तों चाचा ने दिल जीत लिया । हम दोनों की समझ में नहीं आ रहा था की क्या कहें। उन्होंने बोलने लायक जो नही छोड़ा था। आगे वो बोले कि ये तो बेटा फ़ल खाने की बात कर रहे हो। आज हम अगर जिंदा है । सांस ले पा रहे है खा पी रहे हैं अपने सारे काम कर पा रहें है हंसते हुए 😊 बल्कि अग़र पेड़ लगाने लायक़ भी है तो उसके पीछे भी पेडों का ही तो हाथ है।

ना ये ऑक्सीजन देते ना जिंदा रह पाते अरे इन्होंने हमारा कहाँ साथ नहीं दिया। बीमार हुए तो दवा के रूप में, खाना पकाना है तो लकड़ी के रूप में बेटा इनकी तो हर चीज़ काम आती है। फ़ूल, पत्ती, छाल, लकड़ी। इनके बिना तो जीवन की कल्पना भी नहीं कि जा सकती।

आनंद ने तो जैसे चाचा की दुखती रग पे हाथ रख दिया हो। मगर चाचा तो जैसे थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे। बोलते ही जा रहे थे। वो भी बिना रुके वो इतने पर ही नहीं रुके बोले…बेटा जितना स्वार्थी आज आदमी  हो गया है ना ख़ासकर पेडों को लेकर … उतना धरती पर कोई जीव नहीं है। अग़र ये बोल सकते तो हमसे कहते हम तुम्हें इतना कुछ देते हैं तुमने हमें क्या दिया।

मैंने सुना है कि कयामत  आती है। जिसमे सब खत्म हो जाता है। अग़र वो समय आया..तो जो विनाश होगा। और अगर उसके बाद भी कोई बचा। और इस बारे में वो खोजेंगे के ये इतना विनाश क्यों हुआ। तो उनमें सबसे पहला, सबसे मुख्य, और सबसे बड़ा कोई कारण अगर होगा तो वो पेड़ ना लगाना और ना सहेजना होगा। क़ुदरत हमें इतना कुछ दे रही है , बदले में इसे हम क्या दे रहे हैं । देना तो दूर जो मिला है उसे संभाल भी नही रहे हैं।

दोस्तों…चाचा की बातों को सुनने के बाद मैं समझ नहीं पाया। के अनपढ़ वो हैं या हम…वो बिना पढ़े-लिखे भी इतना सब जानते और समझते हैं। लेकिन हम पढ़े-लिखे होने के बावजूद भी। इतने अनपढ़ और मूर्ख है कि हम इतना भी नहीं जानते कि हमें पर्यावरण को साफ-सुथरा रखना चाहिए।

और इसके लिए हमें पेड़ लगाने होंगें। और वो भी बिना किसी स्वार्थ के। जबकि फिर भी हर जगह हमारा ही फायदा होगा। दोस्तों चाचा ने आनंद भाई की आँखें तो खोल ही दी। साथ में मेरी भी खुल गयीं । मुझे भी बोहोत अफ़सोस हुआ साथ ही समझ आया के अब तो समय आ ही गया है।

कि हमें ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाने होंगें। जिससे वायुमंडल भी शुद्ध होगा। और फ़ल वाले पेड़ होंगे तो फ़ल भी खाने को मिलेंगे। हम चाहें ना भी खा पायें। हमारी अगली पीढ़ी तो खायेगी। आख़िर हम कब तक टालते रहेंगें। एक न एक दिन तो हमें समझना ही होगा।

क्यों ना समय रहते समझ जाएं। इसी में सबका भला है। नही तो किसी ने कहा है के कुदरत जब लेने पे आती है तो सब ले लेती है। तो क्यों ना आज से ही यह पुण्य का काम किया जाए। जो मानव हित देश हित और सब पशु-पक्षियों के लिए

वरदान से कम ना होगा। ये करके देखिए कितना अच्छा लगता है…अच्छा आप कल्पना करिए आप जिस पेड़ को लगाओ। वो बड़ा हो जाए। कभी उसके पास से भी गुजरोगे तो मन खुश हो जाएगा। पुलकित हो उठेगा। के इसको मैंने लगाया है और अग़र उसकी छाँव में बैठोगे तो जन्नत सा एहसास मिलेगा। एक अलग सा satisfaction जिसको आप पैसों से कभी नहीं खरीद सकते। और अगर वो पेड़ फल वाला हो और उसके फ़ल खाने को भी मिल जाएं।

तो श्री मान आप दुनिया के बहुत ही भाग्यशाली (lucky) लोगों में से एक हैं। हो सके तो इस experiment को कर के देखियेगा। फिर देखना कितना सुकून मिलता है। और ज़रा सोचें.. अग़र आपने कोई पेड़ लगाया है। और आपके वंशज आपके पोता-पोती या पर पुत्र/पुत्री जब ये कहेंगे कि ये पेड़ ना मेले दादा जी या दादी जी ने लदाया था।  तो वो कितना गर्व महसुस करेंंगे। जो आया है जाना तो एक दिन सबको है ये  एक कड़वा सच है।

मगर हमारे जाने के बाद भी सौ, दो सौ, या हो सकता है पाँच सौ साल बाद भी लोग आपको याद रख सकते हैं। जब -जब वो पेड़ दिखेगा आपकी याद दिलाएगा। क्योंकि पेड़ की आयु बहुत लंबी होती है। शायद इस बहाने ही हमारे जाने के बाद कोई  हमें याद रखे। हज़ार परोपकार के बराबर का पुण्य सिर्फ एक पेड़ लगाने से मिल सकता है।

Vishwa Paryavaran Sanrakshan Diwas Kab Manaya Jata Hai 5 June दोस्तों life में कम से कम एक पेड़ तो हमें लगाना ही चाहिये। अगर ज्यादा लगा सकें तो क्या कहने फिर तो सोने पे सुहागा वाली बात है।

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